चैत्र नवरात्रि और विक्रम संवत - हिंदू नववर्ष की शुरुआत
- Anu Goel
- 6 days ago
- 10 min read
Updated: 5 days ago
चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत: एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आरंभ
30 मार्च 2025 से हम विक्रम संवत 2082 में प्रवेश कर रहे हैं।
चैत्र नवरात्र: नव ऊर्जा और आराधना का पर्व
चैत्र नवरात्र हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है और यह माँ दुर्गा की नौ दिवसीय आराधना का समय होता है। इसे वसंत नवरात्र भी कहा जाता है और यह आमतौर पर मार्च-अप्रैल के महीने में आता है।
विशेष महत्व:
✅ माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
✅ इस दौरान व्रत, भजन, हवन और कन्या पूजन किए जाते हैं।
✅ यह नई ऊर्जा, आत्मशुद्धि और सकारात्मकता लाने का अवसर होता है।
विक्रम संवत: भारतीय कालगणना का आधार
विक्रम संवत भारतीय पंचांग का प्रमुख संवत (कालगणना प्रणाली) है, जिसकी शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने की थी।
विक्रम संवत कैलेंडर एक पारंपरिक हिंदू कैलेंडर है जिसका उपयोग भारत और दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में किया जाता है। इसका नाम प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के नाम पर रखा गया है, जिन्हें 1 शताब्दी ईसा पूर्व में इस कैलेंडर की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है।
विक्रम संवत की विशेषताएँ:
✅ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष का आरंभ होता है।
✅ इसे चंद्र-सौर कैलेंडर के आधार पर गणना किया जाता है।
✅ यह संवत धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का आधार है।
विक्रम संवत (Vikram Samvat) भारत का प्राचीन और ऐतिहासिक पंचांग है, जिसका उपयोग हजारों वर्षों से किया जा रहा है। यह न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि खगोलीय गणनाओं के आधार पर इसकी संरचना अत्यंत वैज्ञानिक भी है।
1. विक्रम संवत की शुरुआत और इतिहास
विक्रम संवत की स्थापना राजा विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व (ईसा पूर्व 57) में की थी, जो राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने का वर्ष माना जाता है। यह संवत शक संवत और ग्रेगोरियन कैलेंडर से अलग है और सूर्य-संक्रांति एवं चंद्र मास की गणना पर आधारित है।
✅ प्रमुख विशेषताएँ:
विक्रम संवत, चंद्र-सौर कैलेंडर (Lunisolar Calendar) है।
यह चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है।
यह ईसा पूर्व 57 से 57 वर्ष अधिक होता है (जैसे, यदि ग्रेगोरियन वर्ष 2025 है, तो विक्रम संवत 2082 होगा)।
2. विक्रम संवत की गणना पद्धति
(1) सौर और चंद्र गणना का समन्वय
विक्रम संवत की गणना में सौर वर्ष (सूर्य के आधार पर) और चंद्र महीनों (चंद्रमा के आधार पर) का संतुलन बनाया जाता है।
सौर वर्ष: सूर्य की गति के अनुसार 365 दिन।
चंद्र वर्ष: चंद्रमा के 12 चक्रों (मास) के अनुसार 354 दिन।
अधिक मास (मलमास): हर 3 वर्षों में चंद्र और सौर वर्ष के बीच के 11 दिनों के अंतर को समायोजित करने के लिए अधिक मास (Leap Month) जोड़ा जाता है।
क्षय मास: कभी-कभी यह अंतर कम करने के लिए एक महीना कम (क्षय मास) भी कर दिया जाता है।
दिन : प्रत्येक महीने में 29-32 दिन होते हैं, जो चंद्र चक्र पर निर्भर करते हैं।
✅ इससे विक्रम संवत में मौसम और धार्मिक तिथियाँ स्थिर रहती हैं।
(2) महीनों की गणना
विक्रम संवत के अनुसार वर्ष में 12 मास (महीने) होते हैं, जो चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं:
1️⃣ चैत्र (मार्च-अप्रैल)
2️⃣ वैशाख (अप्रैल-मई)
3️⃣ ज्येष्ठ (मई-जून)
4️⃣ आषाढ़ (जून-जुलाई)
5️⃣ श्रावण (जुलाई-अगस्त)
6️⃣ भाद्रपद (अगस्त-सितंबर)
7️⃣ आश्विन (सितंबर-अक्टूबर)
8️⃣ कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर)
9️⃣ मार्गशीर्ष (अग्रहायण) (नवंबर-दिसंबर)
🔟 पौष (दिसंबर-जनवरी)
1️⃣1️⃣ माघ (जनवरी-फरवरी)
1️⃣2️⃣ फाल्गुन (फरवरी-मार्च)
✅ प्रत्येक माह दो पक्षों में विभाजित होता है:
शुक्ल पक्ष (पूर्णिमा तक बढ़ता चंद्रमा)
कृष्ण पक्ष (अमावस्या तक घटता चंद्रमा)

(3) विक्रम संवत और अन्य संवतों की तुलना
✅ विक्रम संवत ईसा संवत (CE) से 57 वर्ष आगे होता है।
3. विक्रम संवत में पंचांग की गणना
पंचांग विक्रम संवत के अनुसार दिन-प्रतिदिन की खगोलीय और धार्मिक तिथियों को दर्शाने वाला ग्रंथ है। इसमें पाँच मुख्य भाग होते हैं:
1️⃣ तिथि (Lunar Day): चंद्रमा की स्थिति के अनुसार 30 तिथियाँ होती हैं।
2️⃣ वार (Weekday): सात वार (रविवार से शनिवार)।
3️⃣ नक्षत्र (Constellation): 27 नक्षत्र चंद्रमा की गति के अनुसार होते हैं।
4️⃣ योग (Conjunction): सूर्य और चंद्रमा के बीच विशेष गणनाएँ।
5️⃣ करण (Half Tithi): एक तिथि के दो भाग।
✅ इन गणनाओं के आधार पर शुभ मुहूर्त और पर्वों का निर्धारण किया जाता है।
4. विक्रम संवत के विशेष पर्व और त्यौहार
विक्रम संवत के अनुसार सभी प्रमुख भारतीय त्योहारों की तिथियाँ निर्धारित होती हैं।
📌 चैत्र नवरात्रि और नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)
📌 राम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी)
📌 गुरुपूर्णिमा (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा)
📌 रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा)
📌 कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी)
📌 दुर्गा पूजा और दशहरा (आश्विन शुक्ल दशमी)
📌 दीपावली (कार्तिक अमावस्या)
📌 मकर संक्रांति (14 या 15 जनवरी - सौर गणना)
✅ अधिकांश हिंदू त्यौहार विक्रम संवत पंचांग के अनुसार मनाए जाते हैं।
5. विक्रम संवत के वैज्ञानिक और खगोलीय पक्ष
✅ सौर और चंद्र चक्र का संतुलन:
चंद्र वर्ष 354 दिन का होता है, और सौर वर्ष 365 दिन का।
इन दोनों का संतुलन विक्रम संवत की गणना में अद्भुत रूप से किया गया है।
✅ ऋतुओं की गणना:
चैत्र से लेकर फाल्गुन तक छह ऋतुएँ (बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) समान रूप से विभाजित होती हैं।
इससे कृषि, वर्षा, और स्वास्थ्य संबंधी पूर्वानुमान लगाना आसान होता है।
✅ ग्रहों की चाल और धार्मिक अनुष्ठान:
ग्रहण, संक्रांति, और अन्य खगोलीय घटनाओं की सटीक गणना विक्रम संवत के पंचांग में होती है।
इसलिए, यज्ञ, विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, और अन्य संस्कारों के लिए पंचांग देखा जाता है।
विक्रम संवत केवल एक तिथि गणना पद्धति नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, खगोलशास्त्र और धर्म का आधार है। इसकी वैज्ञानिक संरचना और खगोलीय गणना इसे सबसे सटीक पंचांग प्रणालियों में से एक बनाती है।
कुल मिलाकर, विक्रम संवत कैलेंडर हिंदू परंपरा और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और दुनिया भर में लाखों लोगों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।
चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत का आपसी संबंध
चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत का संबंध नए आध्यात्मिक और सामाजिक चक्र की शुरुआत से है। यह समय न केवल ईश्वरीय साधना, बल्कि नए संकल्पों और सकारात्मक जीवनशैली को अपनाने का भी होता है।

चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ
1. चैत्र नवरात्र का ऐतिहासिक महत्व
चैत्र नवरात्र का संबंध पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं से भी जुड़ा हुआ है:
✅ रामायण और राम नवमी:
चैत्र नवरात्र के अंतिम दिन, राम नवमी का पर्व मनाया जाता है।
भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को हुआ था।
इस कारण, यह समय धार्मिक आस्था और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों को अपनाने का भी होता है।
✅ महाभारत और देवी उपासना:
महाभारत के दौरान, पांडवों ने चैत्र नवरात्र में माँ दुर्गा की उपासना की थी।
माँ दुर्गा की कृपा से उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त हुई।
✅ ऋतु परिवर्तन और कृषि से जुड़ाव:
यह समय बसंत ऋतु की शुरुआत का होता है, जब प्रकृति नई ऊर्जा और सृजनशीलता से भर जाती है।
यह किसान समुदाय के लिए नई फसल की बुवाई और कृषि कार्यों की शुरुआत का समय भी होता है।
2. विक्रम संवत: भारतीय कालगणना की आधारशिला
विक्रम संवत की स्थापना राजा विक्रमादित्य (उज्जैन) ने की थी।
✅ कब और क्यों शुरू हुआ?
यह संवत ईसा पूर्व 57 में शुरू हुआ, जब राजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रमणकारियों को हराकर भारत में एक नए युग की शुरुआत की।
इसे भारत का राष्ट्रीय संवत भी कहा जाता है और यह आज भी अधिकतर हिंदू पंचांगों में मान्य है।
✅ विशेषताएँ:
यह चंद्र-सौर पंचांग पर आधारित है, जिससे यह सौर (सूर्य) और चंद्र (चंद्रमा) की गतियों को ध्यान में रखकर समय गणना करता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में त्योहारों, विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ और अन्य शुभ कार्यों के लिए इसे आधार माना जाता है।
नेपाल सरकार विक्रम संवत को आधिकारिक कैलेंडर के रूप में मान्यता देती है।
3. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
✅ चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत दोनों ही नए संकल्प, आध्यात्मिक साधना और आत्मशुद्धि का प्रतीक हैं।
✅ यह समय हमें अपने भीतर शक्ति, अनुशासन और आत्मनिरीक्षण करने का अवसर देता है।
✅ भारत में इसे गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र), उगाड़ी (आंध्र प्रदेश और कर्नाटक) और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के रूप में भी मनाया जाता है।
चैत्र नवरात्र: व्रत विधि, पूजा पद्धति और ज्योतिषीय महत्व
चैत्र नवरात्र केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह नवसंवत्सर की शुरुआत, आत्मशुद्धि और नए संकल्पों का समय भी होता है। इस दौरान सही विधि से पूजा, व्रत और साधना करने से विशेष फल मिलता है।
1. चैत्र नवरात्र व्रत विधि
नवरात्रि में व्रत रखने से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं। व्रत के नियम और प्रकार इस प्रकार हैं:
✅ पूर्ण व्रत (निर्जला या फलाहार व्रत)
इस व्रत में निरंतर 9 दिनों तक भोजन नहीं किया जाता, केवल जल या फलाहार लिया जाता है।
यह सख्त अनुशासन और मानसिक संकल्प की परीक्षा होती है।
✅ एक समय भोजन (एकहारी व्रत)
इसमें दिनभर उपवास रखा जाता है और केवल सूर्यास्त के बाद एक बार सात्विक भोजन किया जाता है।
यह शरीर और मन को अनुशासन में लाने के लिए सबसे उपयुक्त व्रत माना जाता है।
✅ हल्का व्रत (सात्विक भोजन व्रत)
इसमें केवल सात्विक और फलाहारी भोजन जैसे दूध, फल, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, और आलू का सेवन किया जाता है।
यह शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक भी होता है।
2. पूजा विधि (Navratri Puja Vidhi)
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

✅ माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र
✅ कलश (मिट्टी का घड़ा) और जल
✅ आम या अशोक के पत्ते
✅ नारियल, लाल कपड़ा और मौली
✅ कुमकुम, अक्षत (चावल), हल्दी, धूप और दीप
✅ फूल, फल, पंचामृत और भोग (हलवा-पूरी या खीर)
पूजा की संपूर्ण विधि:
1️⃣ कलश स्थापना (घटस्थापना)
नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है।
मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं, जो शुभता और समृद्धि का प्रतीक हैं।
कलश में जल भरकर उस पर नारियल और आम के पत्ते रखे जाते हैं।
2️⃣ दुर्गा सप्तशती पाठ और आरती
माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती, देवी कवच और अर्गला स्तोत्र का पाठ किया जाता है।
शाम को दीप जलाकर माँ की आरती करनी चाहिए।
3️⃣ अखंड ज्योति प्रज्वलित करना
नवरात्रि में अखंड ज्योति (घी का दीपक) जलाने का विशेष महत्व है।
यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और माँ की कृपा बनाए रखता है।
4️⃣ कन्या पूजन (अष्टमी और नवमी को)
अष्टमी और नवमी तिथि को कन्या पूजन किया जाता है।
9 कन्याओं और 1 बालक (भैरव) को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
इसे माँ दुर्गा की सर्वोच्च पूजा माना जाता है।
3. ज्योतिषीय महत्व (Astrological Significance)
✅ चैत्र नवरात्र और ग्रह स्थिति
सूर्य और चंद्रमा इस समय अपनी विशेष स्थिति में होते हैं, जिससे यह समय साधना और आत्मचिंतन के लिए उत्तम माना जाता है।
इस दौरान ग्रहों की अनुकूलता के कारण नकारात्मकता कम होती है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
✅ व्यक्तिगत राशियों पर प्रभाव
मेष, सिंह, वृश्चिक राशि वालों के लिए यह समय नए कार्यों की शुरुआत के लिए उत्तम है।
मिथुन, तुला, कुंभ राशि वालों के लिए यह समय ध्यान और साधना का है।
कन्या, मकर, वृषभ राशि वालों को धन और करियर में उन्नति के योग मिलते हैं।
✅ चैत्र नवरात्र और नवग्रह पीड़ा निवारण
माँ दुर्गा की श्री सूक्त पाठ करने से शनि, राहु और केतु दोष शांत होते हैं।
माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से मंगल ग्रह के दोष समाप्त होते हैं।
महागौरी की पूजा से चंद्र ग्रह के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।
4. चैत्र नवरात्र में क्या करें और क्या न करें?
✅ क्या करें?
✔️ सात्विक और शुद्ध भोजन करें।
✔️ प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें।
✔️ दूसरों की सहायता करें और दान करें।
✔️ मन, वाणी और कर्म से संयम रखें।
❌ क्या न करें?
❌ नकारात्मक विचारों और क्रोध से बचें।
❌ लहसुन, प्याज, मांस और शराब का सेवन न करें।
❌ तामसिक भोजन या बासी भोजन न करें।
❌ व्रत के दौरान किसी का अपमान या बुरा न बोलें।
5. नवरात्रि में कैसे पाएं मनोकामना सिद्धि?

यदि आप धन, स्वास्थ्य, करियर या संतान से संबंधित कोई मनोकामना रखते हैं, तो नवरात्रि के दौरान विशेष मंत्र जाप करने से शीघ्र फल प्राप्त हो सकते हैं।
मंत्र: "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"* का 108 बार जाप करें।
माँ दुर्गा को लाल फूल, सिंदूर और नारियल अर्पित करें।
चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत केवल धार्मिक पर्व नहीं हैं, बल्कि यह संस्कार, अनुशासन और आत्मशुद्धि का समय होता है। यह नववर्ष की एक नई शुरुआत है, जिसमें हम न केवल ईश्वर की आराधना करते हैं, बल्कि अपने भीतर आत्मबल और ऊर्जा भी संचित करते हैं।
चैत्र नवरात्रि: विशेष मंत्र, चालीसा और ज्योतिषीय उपाय
चैत्र नवरात्रि के दौरान मंत्र जाप, चालीसा पाठ और ज्योतिषीय उपाय करने से मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। प्रत्येक देवी का एक विशेष मंत्र होता है, जिसे जाप करने से संबंधित लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
1. नवरात्रि के विशेष मंत्र और उनके लाभ
(1) माँ शैलपुत्री (पहले दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः"
✅ लाभ:
मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ता है।
नई ऊर्जा और उत्साह प्राप्त होता है।
(2) माँ ब्रह्मचारिणी (दूसरे दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः"
✅ लाभ:
ध्यान और साधना में उन्नति होती है।
नौकरी और शिक्षा में सफलता मिलती है।
(3) माँ चंद्रघंटा (तीसरे दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः"
✅ लाभ:
नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं से रक्षा होती है।
मन की चंचलता समाप्त होती है।
(4) माँ कूष्मांडा (चौथे दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः"
✅ लाभ:
धन, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।
रोगों से मुक्ति मिलती है।
(5) माँ स्कंदमाता (पांचवें दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी स्कंदमातायै नमः"
✅ लाभ:
पारिवारिक सुख-शांति बढ़ती है।
संतान सुख की प्राप्ति होती है।
(6) माँ कात्यायनी (छठे दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी कात्यायन्यै नमः"
✅ लाभ:
विवाह में आ रही अड़चनों का निवारण होता है।
प्रेम और दांपत्य जीवन में मधुरता आती है।
(7) माँ कालरात्रि (सातवें दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी कालरात्र्यै नमः"
✅ लाभ:
शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
तंत्र-मंत्र बाधाओं का नाश होता है।
(8) माँ महागौरी (आठवें दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी महागौर्यै नमः"
✅ लाभ:
मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
पवित्रता और सकारात्मकता बढ़ती है।
(9) माँ सिद्धिदात्री (नवें दिन)
✅ मंत्र:"ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः"
✅ लाभ:
सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
जीवन में सफलता और मनोकामना पूर्ति होती है।
2. दुर्गा चालीसा पाठ के लाभ
दुर्गा चालीसा का नवरात्रि में पाठ करने से विशेष लाभ मिलते हैं:
✅ घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
✅ किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव और बुरी शक्तियों से बचाव होता है।
✅ ग्रह दोष और शनि की साढ़े साती का प्रभाव कम होता है।
✅ मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता है।
📜 दुर्गा चालीसा का विशेष श्लोक:"नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी।।"

3. ज्योतिषीय उपाय (Navratri Jyotish Upay)
(1) आर्थिक उन्नति के लिए उपाय
💰 हर रोज माँ लक्ष्मी को कमल का फूल और शुद्ध घी का दीपक अर्पित करें।
💰 "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
💰 शुक्रवार को 11 कौड़ियाँ लाल कपड़े में बाँधकर तिजोरी में रखें।
(2) विवाह में विलंब हो रहा हो तो उपाय
💍 नवरात्रि में माँ कात्यायनी की विशेष पूजा करें।
💍 "कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नंद गोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥"
💍 नवरात्रि में गाय को गुड़ और रोटी खिलाएँ।
(3) नौकरी और करियर में सफलता के लिए उपाय
📖 सुबह स्नान के बाद माँ सरस्वती को सफेद फूल अर्पित करें।
📖 "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
📖 किसी गरीब विद्यार्थी को कॉपी-किताब दान करें।
(4) संतान सुख के लिए उपाय
👶 माँ स्कंदमाता की पूजा करें और सफेद वस्त्र धारण करें।
👶 "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें।
👶 किसी निर्धन कन्या को मीठा भोजन कराएँ।
(5) घर में सुख-शांति बनाए रखने के उपाय
🏡 नवरात्रि के दौरान घर में अखंड ज्योति प्रज्वलित करें।🏡 प्रतिदिन शंख और घंटी बजाकर माँ की आरती करें।🏡 मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करें।
निष्कर्ष
नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और नए संकल्पों का पर्व भी है। यदि सही विधि से मंत्र जाप, दुर्गा चालीसा पाठ और ज्योतिषीय उपाय किए जाएँ, तो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभता आती है।
चैत्र नवरात्र और विक्रम संवत केवल धार्मिक परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत, वैज्ञानिक सोच, और ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक भी हैं। यह हमें नवजीवन, आत्मशक्ति और एक नई शुरुआत की प्रेरणा देते हैं।
Comentarios